सप्लाई चेन से जुड़े ऐसे प्रोजेक्ट जो कॉर्पोरेट की सामाजिक ज़िम्मेदारियों (सीएसआर) को निभाते हैं

मनोनो की खानों में बाल मज़दूरी के ख़िलाफ़ लड़ाई

अक्टूबर 2018
हवाई जहाज़ जैसे खिलौने से खेलता हुआ बच्चा

Google के लिए 2016 में मानवतावादी गैर-लाभकारी संस्था Pact से जुड़ना एक स्वाभाविक कदम था, ताकि कॉन्गो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) के टिन और कोबाल्ट कारोबारों से बाल मज़दूरी को पूरी तरह से खत्म करने के हमारे लक्ष्य को हासिल किया जा सके.

Pact की विशेषज्ञता और डीआरसी में मज़बूत रिश्तों की वजह से इस संस्था ने खनन से जुड़े समुदायों के बीच एक दशक से भी ज़्यादा समय तक काम किया है. साथ ही, संगठन को ऐसे मसलों में समाधान ढूंढने के लिए काबिल बनाया है जो पहले संभव नहीं थे. इसके माइंस टू मार्केट (M2M) कार्यक्रम को Google ने भी आर्थिक सहायता दी है. डीआरसी की खानों में गहरी पकड़ बना चुकी बाल मज़दूरी से बच्चों को बाहर निकालने के लिए व्यापक योजना बनाई गई है और बड़े स्तर पर इस समुदाय की मदद के लिए आउटरीच कार्यक्रम डिज़ाइन किए गए हैं.

Pact ने M2M कार्यक्रम के लिए नींव रखने का काम किया है. उन्होंने इस इलाके में खनन का काम करने वाले लोगों और दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर समझा है कि बाल मज़दूरों और उनके परिवारों को किस तरह की दिक्कतें आती हैं. इसके बाद, Pact ने एक नेटवर्क बनाना शुरू किया, ताकि खानों में काम कर रहे बाल मज़दूरों और उनके परिवारों को रोज़गार के दूसरे विकल्प दिए जा सकें.

डीआरसी की खानों में, Google और Pact की साझेदारी के शानदार नतीजे देखे जा सकते हैं. खानों में काम करने वाले, मनोनो गांव के बाल मज़दूरों पर बनी एक शॉर्ट फ़िल्म में ये नतीजे दिखाए गए हैं. यह शॉर्ट फ़िल्म हाल ही में रिलीज़ हुई है और इसका नाम Watoto Inje ya Mungoti (चिल्ड्रन आउट ऑफ़ माइनिंग) है.

बदलाव के चेहरे

इस फ़िल्म को Pact ने बनाया है. इसमें, गांव की जीवनशैली के सीन और M2M कार्यक्रम में शामिल लोगों के इंटरव्यू दिखाए गए हैं. ऐसा करके, उन लोगों की आवाज़ को बुलंद किया गया है जिनकी मदद के लिए M2M कार्यक्रम शुरू किया गया. साथ ही, इस फ़िल्म में M2M कार्यक्रम से मनोनो गांव में आए बदलावों को भी दिखाया गया है.

आमने-सामने बैठकर बातचीत करते दो लोग. उनके सामने मेज पर माइक्रोफ़ोन और काग़ज़ रखे हैं.
जोस एक बाल मज़दूर रह चुकी है, वह मनोनो के उन निवासियों में से एक है जिन्होंने Pact के एम2एम कार्यक्रम में हिस्सा लेकर नए हुनर सीखे हैं.

मनोनो की खानों में सालों तक अपने परिवार के साथ काम करने के बाद, एक किशोरी जोस, अब रेडियो पत्रकार बन गई हैं. वह अपने गांव के लोगों से मुलाकात करती हैं और उनसे खनन कारोबार में काम करने के खतरों के बारे में सवाल पूछती हैं.

जोस के दोस्त और पड़ोसी, फ़ॉस्टिन के जीवन में भी बदलाव आया है. फ़ॉस्टिन ने कई साल तक खानों से बाल्टी की मदद से रेत निकालने और धोने का काम किया है. आज, वह कंप्यूटर के क्षेत्र में अपना करियर बना रहा है.

फ़ॉस्टिन के अंकल फ़ेलिसियन, M2M के माता-पिता जागरूकता कार्यक्रम के तहत स्नातक की डिग्री ले चुके हैं. अब वे अपने समुदाय के दूसरों लोगों से चर्च, स्कूलों, और दूसरी सभाओं में बात करते हैं. ऐसा करके, वे उन्हें खानों में काम करने के दौरान होने वाले खतरों और खनन के सीमित आर्थिक फ़ायदों के बारे में जानकारी देकर जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं.

जोस फ़िल्म में कहती हैं, "आज, मेरे दोस्त—मनोनो के बच्चे—खुशी से कहते हैं कि हमारे पास काम के दूसरे विकल्प भी हैं."

आज की तारीख में, Pact संस्था की मुहिम से करीब 1,000 बच्चों ने खानों में काम करना छोड़ दिया है. इस क्षेत्र में बाल मज़दूरी में 90% तक की कमी आई है. मनोनो की सफलता की कहानियां उत्साह बढ़ाती हैं, लेकिन अभी काफ़ी कुछ करना बाकी है.

समस्या को जड़ से हटाना है

दुर्भाग्य से, डीआरसी की खानों के लिए बच्चों को बेहतर मज़दूर माना जाता है. ये बच्चे छोटी सुरंगों में काम और खुदाई करते हैं, चट्टानें तोड़ते हैं, और खनिज के स्रोतों को धोते हैं. काफ़ी ज़्यादा काम कराया जाता है: सात साल की उम्र से बड़े बाल मज़दूरों में से करीब आधे, दिन भर में आठ घंटे से भी ज़्यादा समय तक काम करते हैं.

काम करते हुए पांच लोग. वे टूल की मदद से कीचड़ और गंदगी निकाल रहे हैं.
खनन कारोबार में, बच्चे कभी-कभी ज़रूरी भूमिका निभाते हैं, जिसे तुरंत आसानी से बदला नहीं जा सकता है, इससे बाल मज़दूरी खत्म करने की मुहिम और मुश्किल हो जाती है.

इन हालातों को बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया जाता है, यह जानते हुए कि बाल मज़दूरी गैरकानूनी है. साथ ही, ज़हरीली चीज़ों, साफ़-सफ़ाई की कमी, और धूल भरे पहाड़ी इलाकों में काम करने से होने वाली बीमारियों और चोट के खतरे भी स्वीकार कर लिए जाते हैं. भावनात्मक और शैक्षणिक वजहें भी हैं: खास तौर पर छोटे बच्चों को ज़रूरी पोषण नहीं मिल पाता और बड़े बच्चों के लिए खानों में काम करने का मतलब है, स्कूल जाने से छुटकारा. इसके अलावा, मेहनताना भी काफ़ी कम मिलता है.

मनोनो में साक्षरता कार्यक्रम से जुड़े स्वयंसेवक, रोज़ बंज़ा युम्बा कहते हैं, "खानों में काम करके मिलने वाले पैसों से, सिर्फ़ खाने और कपड़ों की ज़रूरतें ही पूरी हुईं." “हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं हो सकी.”

Pact के स्थायी आजीविका कार्यक्रम के प्रबंधक, बेन काट्ज़ कहते हैं कि खान में बच्चों से काम कराना, इस इलाके के बुनियादी ढांचे में इस तरह शामिल हो चुका है कि इसे खत्म करना काफ़ी मुश्किल है. साथ ही, यहां रोज़गार के विकल्प भी इतने सीमित हैं कि कोई दूसरी नौकरी उपलब्ध ही नहीं है.

काट्ज़ के पास, डीआरसी और इसके आस-पास के क्षेत्रों में काम करने और रहने का काफ़ी अनुभव है. उन्होंने सीखा है कि जैसे किसी परिवार का एक सदस्य, दूसरे सदस्यों पर असर डालता है वैसे ही किसी गांव का एक हिस्सा, दूसरे हिस्सों पर असर डालता है. इसी वजह से, Pact के कार्यक्रम के तहत सिर्फ़ बच्चों को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव को टारगेट किया जाता है.

सबका साथ - सबका विकास

M2M कार्यक्रम में, बेहतर तरीके से बच्चों की परवरिश करने का पाठ्यक्रम, समुदाय को एकसाथ आगे बढ़ाने की कोशिश, गांव के प्रशासन और नीतियों वगैरह की क्षमता का आकलन करना शामिल है. साथ ही, इस कार्यक्रम में, साक्षरता को बढ़ावा देने वाली आर्थिक शिक्षा (अप्रेंटिसशिप) और ऐसी ट्रेनिंग भी शामिल हैं जिससे बच्चों और वयस्कों को कारोबार करने के बारे में समान तौर पर जानकारी मिलती है.

ये चीज़ें व्यावहारिक कैसे हो पाती हैं?

आउटरीच टीमें, फ़ॉस्टिन जैसे बच्चों से मिलती हैं, उन्हें मनोरंजक गतिविधियों में भाग लेने के लिए न्योता देती हैं, और फिर नए कौशल सीखने के लिए शिक्षण कार्यक्रमों में बुलाती हैं.

क्षमता का आकलन करने वाली टीमें, गांव की शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवाओं की ताकत और कमज़ोरियों का पता लगाती हैं और जिस क्षेत्र में ज़रूरत है उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश करती हैं.

माता-पिता में जागरूकता लाने के कार्यक्रमों में खनन से पैदा होने वाले ज़िंदगी और मौत के हालातों के बारे में बताया जाता है. यह एक बहुत ज़रूरी जानकारी है, क्योंकि बच्चे अक्सर खनन की दुनिया में अपने परिवारों की वजह से ही उतरते हैं. इन कार्यक्रमों के ज़रिए, फ़ेलिसियन जैसे लोग परिवारों को सलाह देते हैं, धीरे-धीरे नए व्यवसाय और कारोबारी कौशल सीखने के फ़ायदे समझाते हैं, जिससे परिवार के आर्थिक हालात में सुधार आए और वे खनन कारोबार छोड़ने में परहेज़ न करें.

मनोनो में चमकीले रंग की पोशाक में लोगों का एक ग्रुप, पारंपरिक तरीके से साबुन बनाना सीखते हुए. इन्हें उम्मीद है कि एक दिन ये लोग औद्योगिक साबुन का कारोबार शुरू करेंगे.
मनोनो में एक समूह, हाथ से साबुन बनाना इस उम्मीद में सीख रहा है कि वे लोग एक दिन हाथ से बने साबुन का कारोबार खोलेंगे.

कार्यक्रम में भाग लेने वाले युम्बा कहते हैं, "[कार्यक्रम] ने हमें पढ़ने, लिखने, हमारे पैसे बचाने, और छोटे व्यवसाय में निवेश करने के लिए प्रशिक्षित किया है."

काट्ज़ ज़ोर देकर कहते हैं कि हर गांव से बाल मज़दूरी को खत्म करना Pact का लक्ष्य है, लेकिन इसके लिए हर गांव में अलग-अलग तरीके इस्तेमाल होते हैं.

वह कहते हैं, "हर जगह का माहौल अलग होता है." "दो जगहें भले ही एक-दूसरे के काफ़ी पास मौजूद हों, लेकिन उनके माहौल में अंतर हो सकता है.”

लंबे समय के लिए बदलाव हो

M2M कार्यक्रम के सीनियर ग्लोबल डायरेक्टर, काट्ज़ और कैरन हायेस का मानना है कि अगला लक्ष्य, Pact के बहुआयामी नज़रिए को लंबे समय तक चलने वाला और आगे बढ़ने लायक बनाना है. हालांकि, वे अकेले इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकते.

हेयस कहते हैं, "मैं अक्सर कहता हूं कि खनन से बाल मज़दूरी से छुटकारा पाने में सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लोगों को लगता है इसे खत्म करना बहुत मुश्किल काम है." “इससे छुटकारा पाने में बहुत समय लगेगा. यह किसी और की परेशानी है.”

ऐसी नकारात्मक मानसिकता का मुकाबला करने के लिए, जागरूकता बढ़ाना, लोगों की परेशानियों को सबके सामने लाना, और सफलता मिलने पर लोगों से उसकी चर्चा करना बहुत ज़रूरी है. ऐसा करना, फ़ंड देने वाले नए पार्टनर और सहयोगी पाने के लिए भी ज़रूरी है.

इसे ध्यान में रखते हुए, Pact, डीआरसी के अलग-अलग हिस्सों में 'चिल्ड्रन आउट ऑफ़ माइनिंग' शॉर्ट फ़िल्म की स्क्रीनिंग करने की तैयारी कर रही है. यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि डीआरसी में बाल मज़दूरी को खत्म करना, शायद एक धीमी और चुनौती भरी प्रक्रिया है. हालांकि, Pact जैसी गैर-लाभकारी संस्थाओं की लगातार कोशिशों और Google जैसी कॉर्पोरेट कंपनियों की मदद से हालात बेहतर हो सकते हैं.

मनोनो की सफलता इसका एक सटीक उदाहरण है.