पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट

Earth Engine की मदद से, जंगलों को होने वाले नुकसान का लाइव मैप बनाया जाता है

दिसंबर 2016
डेटा केंद्र की दीवार के सामने खड़ा एक तकनीशियन.

2005 में, Google में काम करने वाली रिबेका मूर नाम की एक इंजीनियर को एक नोटिस मिला. यह नोटिस सेंटा क्रूज़ माउंटेन्स में अपने घर के पास होने वाले लॉगिंग प्लान यानी पेड़ काटने की योजना के बारे में था. डाक में एक धुंधला सा काला-सफ़ेद मैप था, जिससे कुछ पता नहीं चल रहा था कि पेड़ काटने से और क्या-क्या खतरे में पड़ जाएगा. इससे नाराज़ होकर मूर ने तय किया कि वह Google Earth में 3-D सैटलाइट इमेजरी के मुताबिक बनी योजना की जानकारी का इस्तेमाल करके नया [मैप] बनाएंगी (https://www.youtube.com/watch?v=0-_I-0Mv2DI&feature=youtu.be). मूर के इस कदम से साफ़ हो गया कि इस योजना में क्या-क्या दांव पर लगेगा. Google Earth मैप ने उन्हें बताया कि: 1000 एकड़ में होने वाली यह कटाई असल में कहां-कहां होगी, पानी और पुराने रेडवुड पेड़ों को क्या खतरा होगा, और संकरे पहाड़ी रास्ते भी कैसे एक चुनौती पेश करेंगे, क्योंकि लकड़ी ले जाने वाले ट्रक, अंधे मोड़ पर स्कूल जाते बच्चों के पास से गुज़रेंगे.

मैप देखकर समुदाय के लोग सावधान हुए और उन्होंने योजना की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल की. नतीजा यह हुआ कि कैलिफ़ोर्निया के वन विभाग ने यह योजना अस्वीकार कर दिया. स्थानीय स्तर पर मिली यह सफलता काफ़ी अहम थी. मूर और Google Earth की टीम, जिस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए मिलकर काम कर रहे थे, यह सफलता उस दिशा में पहले कदम की तरह थी: अगर एक इलाके में होने वाले असर को इतनी जल्दी और सही तरीके से देखा जा सकता है, तो क्या हम पूरी दुनिया के जंगलों में हो रहे बदलावों को बढ़िया रिज़ॉल्यूशन में नहीं देख सकते?

आसमान से हरे-भरे इलाके का नज़ारा

साल 2013 से पहले इसका जवाब था, नहीं. जंगल बचाने के लिए काम कर रहे लोग, जंगलों की कटाई के ख़िलाफ़ लंबे समय से जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए उन्हें काफ़ी संघर्ष भी करना पड़ा है. जंगलों को होने वाले नुकसान की वजहें काफ़ी जटिल हैं. साथ ही, पहले से मौजूद जानकारी ज़्यादातर गलत, अधूरी, और पुरानी थी. नासा (NASA) के सैटलाइट से मिली जंगलों की इमेज कई दशकों से मौजूद थीं. हालांकि, डेटा अच्छे रिज़ॉल्यूशन में नहीं था या दुनिया भर में एक जैसा डेटा उपलब्ध नहीं था. इसे देखने के लिए, एक खास तरह के हार्डवेयर की ज़रूरत पड़ती थी. इस वजह से, यह डेटा उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) देशों, सामाजिक मुद्दे उठाने वाले संगठनों, और उन दूसरे समूहों की पहुंच से बाहर था जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी.

यहां वह प्लैटफ़ॉर्म बहुत ज़रूरी था जिसकी मदद से सभी बड़े-बड़े तकनीकी संसाधनों के बिना भी उन तस्वीरों के संग्रह (इमेजरी) का इस्तेमाल कर पाएं. 2009 में कोपेनहेगन में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP15) में, जब मूर की अगुवाई में उनकी टीम ने Google Earth Engine लॉन्च किया, तो सब कुछ समझ आने लगा. Google Earth Engine एक ऐसा प्रोटोटाइप था जो Google के डेटा, स्टोरेज, और कंप्यूटिंग क्षमता को इस्तेमाल करते हुए, अब तक लोगों की पहुंच से बाहर रहे NASA की तस्वीरों के संग्रह (इमेजरी) जैसे विश्व-स्तरीय डेटा को समझा सकता था. ये "वनों में आए बदलाव को चुटकियों में दिखा सकता था.”1

इस बड़ी कामयाबी ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलेंड के रिमोट सेंसिंग वैज्ञानिक मैट हैनसन का ध्यान खींचा. वह अब इस प्रोजेक्ट के साथ प्रमुख सहयोगी के तौर पर काम कर रहे हैं. हैनसन याद करते हुए बताते हैं, Google के शामिल होने से पहले, धरती का मैप ज़्यादातर “बहुत गलतियों से भरा हुआ” होता था.2 Earth Engine प्रोटोटाइप की संभावना के बारे में, अपनी दिलचस्पी के चलते हैनसन ने ज़मीन के बड़े खाली हिस्से पर परीक्षण करने के लिए, Google के इंजीनियरों के साथ काम किया. उन्होंने मेक्सिको को चुना, जहां उसी दौरान Google Earth Outreach शुरू हो रहा था. इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में फ़ैले जंगल का मैप तैयार किया गया, जिसका 30-मीटर का रिज़ॉल्यूशन पहले के मुकाबले हज़ारों गुना ज़्यादा साफ़ था. उसके बाद, टीम ने माना कि पूरी दुनिया का मैप बनाना ज़रूरी है.

आसमान से दक्षिण अमेरिका का नज़ारा
ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच का इंटरफ़ेस, जिस पर एमेज़ॉन के जंगलों को 2014 में हुआ नुकसान दिखाया गया है

इन चीज़ों को असलियत में बदलने का तरीका क्लाउड था. पृथ्वी की पूरी ज़मीनी सतह का अच्छे रिज़ॉल्यूशन वाला मैप बनाने के लिए पेटाबाइट में डेटा प्रोसेस करना पड़ता है, जिसके लिए एक मशीन से बहुत ज़्यादा कंप्यूटिंग पावर की ज़रूरत पड़ती है. दुनिया भर में फैले जंगल का मैप बनाने के लिए, Earth Engine ने क्लाउड के साथ काम करने वाले सर्वरों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया. ऐसा करके एक साथ काम कर रहे 10,000 कंप्यूटरों पर 6,50,000 इमेज प्रोसेस किया गया.3 इस काम को करने के लिए एक कंप्यूटर को 15 साल लग जाते. इसमें Earth Engine को कुछ दिन लगे. मूर बताती हैं “जब हमने इसे चलाया, तो हमने Google में रोशनी को हल्का कर दिया था.”4

यह नतीजा भौगोलिक विज्ञान के क्षेत्र में एक अहम सफलता थी. मैरीलेंड विश्वविद्यालय/Google का डेटा सेट, जंगलों में हो रहे बदलावों का अच्छे रिज़ॉल्यूशन वाला पहला ऐसा मैप था जिसमें दुनिया भर में फैले जंगलों को शामिल किया गया. 2013 में साइंस नाम के एक पीयर रिव्यूड जर्नल में छपे एक [पेपर] (http://science.sciencemag.org/content/342/6160/850.full) के ज़रिए पता चला कि इस प्लैटफ़ॉर्म को इसकी सिस्टमैटिक मैपिंग तकनीक के लिए “ह्यूमन जीनोम प्रॉजेक्ट फ़ॉर द वर्ल्ड इकोसिस्टम”5 जैसी शाबाशी मिली.

दुनिया भर में फैले जंगल का मैप बनाने के लिए, Earth Engine ने क्लाउड के साथ काम करने वाले सर्वरों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया. ऐसा करके, एक साथ काम कर रहे 10,000 कंप्यूटरों पर 6,50,000 इमेज प्रोसेस किया गया. अकेले कंप्यूटर को इस काम में 15 साल लग जाते.

अपने प्रोटोटाइप की शुरुआत से ही, Earth Engine टीम गर्म जलवायु वाले देशों को जंगल की निगरानी के लिए मुफ़्त में मदद करने के लिए तैयार है.6 इस वादे को पूरा करने के लिए, इसने ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच (GFW) के साथ भागीदारी की है. यह वर्ल्ड रिसोर्सेज़ इंस्टिट्यूट का बनाया हुआ नेटवर्क है. पूरी दुनिया में पेड़ों की कटाई के बारे में मैप ने जीएफ़डब्ल्यू (GFW) के पास मौजूद डेटा का इस्तेमाल किया. इसके बाद एक मज़बूत प्लैटफ़ॉर्म बनाते हुए, मैप ने उन संवेदनशील क्षेत्रों को दिखाया जिनमें जंगलों की कटाई को लेकर अब तक कोई जानकारी सामने नहीं आई थी. इनमें मैडागास्कर, कई पश्चिमी अफ़्रीकी देशों, दक्षिण पूर्व एशिया के मेकॉन्ग इलाके, और दक्षिण अमेरिका के ग्रान चाको जैसे इलाके शामिल हैं. जंगल बचाने के समर्थक इस बात से भी हैरान थे कि 2012 में इंडोनेशिया में ब्राज़ील से भी ज़्यादा वर्षा-वन काटे गए थे.

जीएफ़डब्ल्यू (GFW) इन जानकारी को अहम अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में पेश करता है और यह सक्रिय रूप से निगरानी, शोध, और सीधे प्रभावित होने वाले समुदायों के साथ काम भी करता है. इसमें यूनाइटेड कोको जैसी कंपनी को अपने वादे तोड़ने के लिए ज़िम्मेदार ठहराने में मदद करने से लेकर जंगलों की सुरक्षा से जुड़े कानून लागू करवाने के काम शामिल हैं. इसके अलावा, फ़िलिपींस में मैनग्रोव पेड़ों की रक्षा करने वाले कानून और इंडोनेशिया में गैरकानूनी आग से लड़ने के लिए हेज़ संधि के समर्थन के काम शामिल हैं.

जीएफ़डब्ल्यू (GFW) की सबसे खास बातों में से एक उसकी रफ़्तार है. क्लाउड कंप्यूटिंग से चलने वाला, इसका डेटा अप-टू-डेट रखा जाता है और इसकी टीम यह सब रीयल टाइम में कर रही है: 2016 में, जीएफ़डब्ल्यू (GFW) ने GLAD अलर्ट (Global Land Analysis & Discovery) लॉन्च किया, जो पेड़ों के नुकसान के बारे में समय पर सूचना देता है. फ़िलहाल, इसका इस्तेमाल कुछ खास इलाकों में हो रहा है, जहां जांच-पड़ताल जारी है और इसे उमस भरी गर्म जलवायु वाले दुनिया भर में फैले जंगलों तक पहुंचाने की योजना है. GLAD अलर्ट, जंगलों को हो रहे नुकसान को कुछ हफ़्तों में ही दिखा देता है, जिसका पता लगाने में पहले सालों लग जाते थे. जीएफ़डब्ल्यू (GFW) अपनी गति और रिज़ॉल्यूशन से छोटे से छोटे इलाके में हो रही खेती को भी दिखा सकता है. इसकी मदद से, वन प्रबंधकों और कानून लागू करने से जुड़े लोगों को, खतरे में आ चुके जंगलों को बचाने का एक अच्छा मौका मिलता है.

globalforestwatch.org

1http://blog.google.org/2009/12/earth-engine-powered-by-google.html

2http://america.aljazeera.com/articles/2013/11/14/scientists-googlecreatehighresmapofchangesinworldsforests.html

3वे इमेज, लैंडसेट सैटलाइट से 12 सालों में ली गई तस्वीरों के संग्रह से तैयार की गईं. इन तस्वीरों से बनाए गए शुरुआती मैप की मदद से, साल 2000 से 2012 तक जंगलों पर नज़र रखी गई. Earth Engine में शामिल पूरे लैंडसेट कैटलॉग में 40 से ज़्यादा सालों की तस्वीरें हैं.

4http://www.nytimes.com/2013/11/15/science/earth/new-interactive-tool-helps-track-earths-forests.html?_r=0

5http://www.nytimes.com/2013/11/15/science/earth/new-interactive-tool-helps-track-earths-forests.html?_r=0

6http://blog.google.org/2009/12/earth-engine-powered-by-google.html

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