पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट

हमसे है प्रकृति और प्रकृति से हम: भारत के पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए, Google के जियोस्पेशल टूल का इस्तेमाल करना

फ़रवरी 2020
हमसे है प्रकृति और प्रकृति से हम: भारत के पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए, Google के जियोस्पेशल टूल का इस्तेमाल करना

दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में, एक खास प्रजाति के छोटे-छोटे पौधे उग रहे हैं. ये पौधे घने जंगलों में तेज़ी से पनप रहे हैं. लैंटाना कैमरा, फूलों वाले पौधों की वरबेना प्रजाति में शामिल पौधा है. यह भारत के कई हिस्सो में पाया जाता है—हालांकि, यह स्थानीय लोगों के लिए फ़ायदेमंद नहीं है.

इन पौधों ने यहां सदियों से रह रहे आदिवासी समुदाय पर गहरा असर डाला है. अशोक ट्रस्ट फ़ॉर रिसर्च इन ईकोलॉजी ऐंड द एनवायरमेंट (एटीआरईई) के एकेडमी फ़ॉर कंज़र्वेशन साइंस एंड सस्टेनेबिलिटी स्टडीज़ में एक शोधकर्ता और कोऑर्डिनेटर के रूप में काम कर रहे डॉ. मिलिंद बन्यन का कहना है, "लैंटाना तेज़ी से फैलने वाली प्रजाति के पौधे होते हैं." “इनमें से कई आदिवासियों के लिए जंगली उत्पादों को इकट्ठा करना और उन्हें बेचना उनकी आय का ज़रिया है.”

एटीआरईई, पर्यावरण और उसके संरक्षण पर शोध करने वाला एक मुख्य संगठन है. इसका मकसद भारत के पर्यावरण और समुदायों को प्रभावित करने वाली खास समस्याओं पर काम करना है. साथ ही, यह इन समस्याओं को समझने और दूसरों को समझाने की कोशिश करता है. इसके लिए, यह Google के मुफ़्त में भौगोलिक जानकारी उपलब्ध कराने वाले जियोस्पेशल टूल का इस्तेमाल करता है. इनमें Google Earth और Google Earth Engine, जैसे टूल शामिल हैं.

डॉ. बन्यन बताते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि इन टूल का मुफ़्त में उपलब्ध होना, एक बहुत अच्छी बात है. इसकी खास वजह यह है कि पेटेंट वाले सॉफ़्टवेयर हमारे जैसे विकासशील-देशों के लिए बहुत महंगे हैं." “इसलिए, Google के मुफ़्त में उपलब्ध ये टूल हमारे शोध के लिए बहुत ज़रूरी हो जाते हैं.”

एक बेहतर आने वाले कल की दिशा में: Earth Outreach की शुरुआत

Google के जियोस्पेशल टूल से शोधकर्ता आस-पास के पर्यावरण को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं.
Google के जियोस्पेशल टूल से शोधकर्ता आस-पास के पर्यावरण को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं.

एटीआरईई की रिसर्च टीम से काफ़ी पहले और यहां से हज़ारों मील दूर, पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी एक और टीम, नई टेक्नोलॉजी तैयार कर रही थी. उस समय एटीआरईई की रिसर्च टीम भी नहीं जानती थी कि वह टीम अपने शोध से जुड़े कामों के लिए Google के टूल का इस्तेमाल कर रही है.

अगस्त 2005 में Google की सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रेबेका मोर को एक नोटिस मिला. उसमें उनके घर के पास मौजूद लंबे सदाबहार पेड़ों को काटने की बात कही गई थी. इन पेड़ों को इमारती लकड़ियां (टिंबर) इकट्ठा करने के लिए काटा जाना था. नोटिस के साथ मिले एक धुंधले से, ब्लैक एंड व्हाइट मैप में वह जगह दिखाई गई थी जहां कटाई की जानी थी. काफ़ी कोशिश के बाद भी रेबेका मोर उसे पढ़ नहीं पा रही थीं.

इसलिए, उन्होंने खुद ही उस मैप को सुलझाने की ठान ली. उन्होंने सैटलाइट से ली गई Google Earth की तस्वीरों का इस्तेमाल करके, मैप से जुड़ी पूरी जानकारी इकट्ठा की. तब तक Google Earth को लॉन्च हुए दो महीने ही हुए थे. सैटलाइट से मिली जानकारी से पता चला कि जिस हिस्से में कटाई की जानी थी वह मैप में दिखाई गई जगह से कहीं ज़्यादा बड़ा था. इतना ही नहीं, वहां कटाई करना गैरकानूनी भी था.

Google Earth से यह अहम जानकारी मिलने के बाद, मूर और उनके पड़ोसियों ने पेड़ों की कटाई को रुकवा दिया. साथ ही, उन्होंने उस इलाके को हमेशा के लिए एक संरक्षित क्षेत्र के रूप में भी घोषित करवाया. इसी को ध्यान में रखते हुए, Google Earth Outreach टीम बनाई गई. इस टीम का मकसद यह पक्का करना था कि जियोस्पेशल टूल और डेटा, हर व्यक्ति की पहुंच में हों और वह इनका इस्तेमाल कर पाए जिससे दुनिया में एक सकारात्मक बदलाव लाया जा सके. साथ ही, टीम ने दुनिया भर की गैर-लाभकारी संस्थाओं को प्रशिक्षण दिया. इसमें इन संस्थाओं को मैपिंग टूल का असरदार तरीके से इस्तेमाल करना सिखाया गया. ऐसे ही एक प्रशिक्षण का उदाहरण Geo for Good summit है. यह Google Earth Outreach के सबसे बड़े इवेंट में से एक है. यह कई दिनों तक चलने वाली एक कॉन्फ़्रेंस है जिसे मैपिंग टूल इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए आयोजित किया जाता है.

एटीआरईई के नए सेंटर फ़ॉर सोशल एंड एनवायरमेंटल इनोवेशन की सीनियर सदस्य और डायरेक्टर डॉ. वीना श्रीनिवासन, साल 2018 में इस सम्मेलन में शामिल हुई थीं. उनका उद्देश्य इन टूल के महत्व को समझना था. उनके इस सम्मेलन में भाग लेने के बाद, एटीआरईई ने बड़े पैमाने पर Google के जियोस्पेशल टूल का इस्तेमाल शुरू कर दिया. हालांकि, उनके कुछ सहकर्मी उससे पहले आयोजित Geo for Good सम्मेलनों में शामिल हो चुके थे.

डॉ. श्रीनिवासन का कहना है, "वैसे तो एटीआरईई, रिमोट सेंसिंग के क्षेत्र में सबसे आगे रहा है, लेकिन मैपिंग से जुड़े Google के उत्पादों से हमें काफ़ी मदद मिली है. इन उत्पादों ने डेटा इकट्ठा करने और उसे इस्तेमाल करने के हमारे तरीके को पूरी तरह बदल दिया है." "Geo for Good summit में भाग लेने से Google के इन टूल के बारे में ज़्यादा जानकारी मिलती है. साथ ही, इनके इस्तेमाल के तरीकों में लगातार बदलाव लाने में भी मदद मिलती है."

पौधों की तेज़ी से फैल रही प्रजातियों का डेटा तैयार करने के लिए सिटिज़न साइंस प्रोग्राम का इस्तेमाल करना

लैंटाना मूल रूप से मध्य अमेरिका का पौधा है. यह भारत में पौधों की कई स्थानीय प्रजातियों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है.
लैंटाना मूल रूप से मध्य अमेरिका का पौधा है. यह भारत में पौधों की कई स्थानीय प्रजातियों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है.

भारत, क्षेत्र और जनसंख्या के हिसाब से एक बड़ा देश है. यहां मानव और प्रकृति का आपस में जुड़ा होना आम बात है. इसलिए, डॉ. बन्यन, लैंटाना जैसी तेज़ी से फैल रही प्रजातियों के उगने की जगहों का डेटा इकट्ठा करने में काफ़ी रूचि रखते हैं.

बन्यन बताते हैं, “लैंटाना के पौधे किसी पेड़ के आस-पास एक मोटी परत की तरह फैल जाते हैं. इसलिए, उस पेड़ की जड़ का विकास रुक जाता है." “कुछ जगहों पर, ये पेड़ों की ऊपरी टहनियों तक भी पहुंच चुके हैं." तमिलनाडु के नीलगिरि ज़िले में रहने वाले किसान जंगली उत्पादों को इकट्ठा करके, पास के बाज़ारों में बेचते हैं. लैंटाना के ज़्यादा मात्रा में उगने से उत्पादों को इकट्ठा करने में रुकावट आ सकती है.

एटीआरईई में डॉ. बन्यन, डॉ. अंकिला हिरेमठ और उनके साथ काम करने वाले अन्य लाेगाें का मानना है कि अगर लैंटाना के उगने की जगहों का पता लगा लिया जाए और उनका रिकॉर्ड रखा जाए, तो इसे फैलने से रोका जा सकता है. इसका पता लगाने के लिए, वे Google Earth का इस्तेमाल करते हैं.

Keystone Foundation और WWF-India के अपने सहयोगियों के साथ मिलकर, एटीआरईई सबसे पहले सामुदायिक स्वयंसेवकों की एक टीम तैयार करता है. साथ ही, यह रिसर्च वाली जगह को छह गुणा छह मील की ग्रिड में बांट देता है. हर ग्रिड में, स्वयंसेवक तीन अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. साथ ही, Google Earth की मदद से वे अपने रूट तैयार करते हैं और उन्हें डिजिटल रूप में बदल देते हैं. इसके बाद, इन रूट को जीपीएस डिवाइस से कनेक्ट कर दिया जाता है, ताकि फ़ील्ड में स्वयंसेवक अपनी जगह की जानकारी पा सकें.

एटीआरईई ने इस तरह की सामुदायिक गतिविधि से आम लोगों को भी जोड़ दिया है. Open Data Kit (ODK), डेटा इकट्ठा करने वाला एक ऐप्लिकेशन है. यह Google के मैपिंग टूल से हर समय कनेक्ट रहता है. इससे कोई भी व्यक्ति उन जगहों के बारे जानकारी इकट्ठा कर सकता है जहां ऐसी प्रजाति के पौधे उगते हैं. इसके बाद, वह एटीआरईई को यह जानकारी भेज सकता है.

डॉ. बन्यन कहते हैं, “इस समय हर व्यक्ति के पास स्मार्टफ़ोन है. इसकी मदद से हम सिटिज़न साइंस प्रोग्राम को और भी मज़बूत बना सकते हैं." अगर कोई व्यक्ति कहीं लैंटाना का पौधा देखता है, तो वह अपने फ़ोन से ही उसकी फ़ोटो लेकर हमें भेज सकता है. साथ ही, उसके उगने की जगह की जानकारी भी भेज सकता है. ऐसा करने पर डेटा, एटीआरईई के सर्वर में अपलोड हो जाता है. इसके बाद, रिसर्च टीम उसकी जांच और विश्लेषण करती है.

उन्होंने आगे कहा, “जब लोग इन टूल का इस्तेमाल करना शुरू करेंगे, तो वे इन्हें पसंद करने लगेंगे.”

एक सुरक्षित भविष्य के लिए पानी बचाने की कोशिश

नोयल-भवानी बेसिन, तमिलनाडु के कृषि क्षेत्र और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ज़्यादातर ज़रूरतों को पूरा करता है. ये क्षेत्र, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में 16% का योगदान देते हैं.

नोयल-भवानी बेसिन, तमिलनाडु के कृषि क्षेत्र और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करता है. ये क्षेत्र राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में 16% का योगदान देते हैं.1

पौधों की इन तेज़ी से फैलने वाली प्रजातियों का डेटा इकट्ठा करने के अलावा, एटीआरईई इन टूल का इस्तेमाल रिसर्च से जुड़े कई अन्य कामों के लिए भी करता है. नीलगिरि ज़िले से 83 मील दूर, पूर्व में स्थित नोयल-भवानी बेसिन, पानी और भूमि से जुड़े कई विवादों से घिरा हुआ है.

नोयल-भवानी, कावेरी बेसिन का उप-बेसिन है. यह करीब 31,000-वर्ग-मील में फैला हुआ है. साथ ही, यहां एटीआरईई, पानी के संरक्षण पर पायलट स्टडी कर रहा है. डॉ. श्रीनिवासन की देखरेख में, एटीआरईई की रिसर्च टीम यहां हाइड्रोलॉजिक मॉडलिंग की एक योजना पर काम कर रही है. इस योजना से यह समझने में मदद मिलेगी कि भूमि के इस्तेमाल और पानी की मांग में समय-समय पर किस तरह का बदलाव आया है. साथ ही, यह जान पाएंगे कि भविष्य में पानी को बचाए रखने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं.

भारत में बिजली बहुत कम कीमत में मिल जाती है और पानी के इस्तेमाल का हिसाब रखना आसान नहीं है. ऐसे में यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन व्यक्ति भूमि के नीचे से कितना पानी निकाल रहा है और किसलिए निकाल रहा है. एटीआरईई की रिसर्च टीम इन चीज़ों के बारे में जानकारी इकट्ठा करती है. वह Google Earth Engine की मदद से पृथ्वी की मल्टी-सीज़नल (अलग-अलग मौसम के मुताबिक) तस्वीरों का विश्लेषण करती है.

पहले सैटलाइट प्रोसेसिंग बहुत मुश्किल काम हुआ करता था. जब एटीआरईई ने Earth Engine की क्लाउड-आधारित तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया, तो यह काफ़ी आसान हो गया. इसमें रिसर्च टीम को पहले तस्वीरें डाउनलोड करनी होती थीं. इसके बाद, उन्हें कंप्यूटर में प्रोसेस करके, एक-एक तस्वीर से बादलों को हटाना होता था. नोयल-भवानी एक छोटा बेसिन है. इसलिए, इसे Google Earth Engine की मदद से मैप किया जा सकता है. हालांकि, कावेरी बेसिन के बड़े हिस्से को मैप करना नामुमकिन के बराबर है.

श्रीनिवासन ज़ोर देकर कहती हैं, “Earth Engine ने इस मुश्किल प्रक्रिया को काफ़ी हद तक आसान बना दिया है.” “मेरे लिए, इसने दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल दिया है. मुझे लगता है कि डेटा के सही इस्तेमाल की हमारी काबिलीयत, इसकी सबसे बड़ी ताकत है. यह डेटा हम फ़ील्ड में काम करके इकट्ठा करते हैं.”

हालांकि, उनकी रिसर्च से मिली जानकारी अभी प्रकाशित नहीं हुई है. इसलिए, इसके असर के बारे में जानने में काफ़ी समय लगेगा. श्रीनिवासन का मानना है कि उनकी टीम ने जो जानकारी इकट्ठा की है वह भूमि से बेहिसाब पानी निकालने की समस्या पर ध्यान खींच सकती है. भूमि के नीचे मौजूद पानी नदियों से जुड़ा होता है. इसके ज़्यादा इस्तेमाल से नदियां सूख सकती हैं. यह आगे चलकर राज्यों के बीच विवादों की वजह बन सकता है.

श्रीनिवासन मानती हैं कि Earth Engine इन विवादों का हल निकालने में काफ़ी अहम भूमिका निभा सकता है. वह कहती हैं, “Earth Engine बहुत शक्तिशाली प्लैटफ़ॉर्म है.” “अगर इसका सही इस्तेमाल किया जाए, तो यह एक बेहतरीन टूल साबित हो सकता है.”

मैपिंग टूल तक लोगों की पहुंच बनाना

इंटरडिसप्लिनरी रिसर्च के क्षेत्र में सबसे आगे रहने वाले शोधकर्ताओं के रूप में, श्रीनिवासन, बन्यन, और उनके सहकर्मी मानते हैं कि शोध से मिली जानकारी लोगों की पहुंच में होनी चाहिए. साथ ही, यह अन्य वैज्ञानिकों के लिए भी उपलब्ध होनी चाहिए. एटीआरईई की टीम अन्य संगठनों और शोधकर्ताओं को भी समय-समय पर प्रशिक्षण देती है. इसमें डेटा को मैप करने और इकट्ठा करने के लिए, ODK के साथ Google के जियोस्पेशल टूल का इस्तेमाल करने के तरीकों के बारे में बताया जाता है. बन्यन कहते हैं, “इसका उद्देश्य अन्य लोगों को इस प्लैटफ़ॉर्म से जोड़ना और उन्हें इन टूल के इस्तेमाल के बारे में बताना है.” “साथ ही, यह लोगों के लिए शोध करने और ज़्यादा जानकारी इकट्ठा करने की अनगिनत संभावनाएं पैदा करता है.”

श्रीनिवासन सहमति जताते हुए कहती हैं, “ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनके पास शोध में काम आने वाले डिवाइस नहीं हैं. जैसे, जीपीएस, आधुनिक कंप्यूटर, और डेटा इकट्ठा करने के लिए टूल. मुझे लगता है कि इन प्रशिक्षणों से बड़े स्तर पर लोगों को इन टूल और इनके इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया जा सकता है.”

1एंजला ऑर्टिगारा, रिचू बेबी, और संकेत भाले, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ वॉटर स्टूअर्डशिप प्रोजेक्ट की खास जानकारी: नोयल-भवानी रिवर बेसिन के बारे में जानकारी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ इंडिया, 2019, http://d2ouvy59p0dg6k.cloudfront.net/downloads/wwf_india_stewardship_web.pdf